उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zulmat ka safar hai chalo bolte raho

ज़ुल्मात का सफ़र है चलो बोलते रहो

ظلمات کا سفر ہے چلو بولتے رہو

शायर: Vikram9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ुल्मात का सफ़र है चलो बोलते रहो
खो जाओगे ख़मोश न हो बोलते रहो

इस शहर-ए-ख़ामुशी में हो ज़िंदा सुबूत दो
ये चुप की क़ब्र छोड़ो उठो बोलते रहो

चुप रहना कुफ़्र और ख़मोशी हराम है
मोमिन हो दीन-ए-इश्क़ के तो बोलते रहो

इतनी तवील रात हमें काटनी है साथ
बे-अंत दास्तान कहो बोलते रहो

अपना हसीन ख़्वाब सुनाते रहो मुझे
ये ख़्वाब टूटने ही न दो बोलते रहो

ये सारी काएनात ख़मोशी का रक़्स है
आवाज़ में सबात है सो बोलते रहो

जितना सुनोगे उतना सुनाएँगे तुम को लोग
दुनिया की एक भी न सुनो बोलते रहो

फिर से ये काएनात बनाओगे ऐ ख़ुदा
तो कुन से बन न पाएगी गो बोलते रहो

सी दी गई है आँख ज़बाँ चाक ज़ेहन कुंद
और हुक्म है कि चुप न रहो बोलते रहो