उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hain kab se pyasi ye meri aankhen magar nazar mein nadi nahin hai

हैं कब से प्यासी ये मेरी आँखें मगर नज़र में नदी नहीं है

ہیں کب سے پیاسی یہ میری آنکھیں مگر نظر میں ندی نہیں ہے

शायर: Vikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हैं कब से प्यासी ये मेरी आँखें मगर नज़र में नदी नहीं है
उफान पर हैं कई समुंदर बदन-नगर में नदी नहीं है

मुझे ये डर है कि हम सभी लोग एक दिन डूब कर मरेंगे
मगर मैं ये भी बता रहा हूँ कि मेरे डर में नदी नहीं है

बहुत सी सैराबियाँ यहाँ पे तड़पती हैं तिश्नगी की ख़ातिर
नदी में कैसा भँवर बना है कि इस भँवर में नदी नहीं है

अजीब सा ये सफ़र है मेरा मैं कश्ती कश्ती भटक रहा हूँ
भँवर किनारा रवानी छोड़ो मिरे सफ़र में नदी नहीं है

रवाँ-दवाँ प्यास ये जुनूँ की बहा न ले जाए होश मेरे
मगर बुझा दे ये प्यास ऐसी जहान भर में नदी नहीं है