उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kai nadiyan mujh mein bah niklin meri miTTi nam karne ke liye

कई नदियाँ मुझ में बह निकलीं मिरी मिट्टी नम करने के लिए

کئی ندیاں مجھ میں بہہ نکلیں مری مٹی نم کرنے کے لیے

शायर: Vikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कई नदियाँ मुझ में बह निकलीं मिरी मिट्टी नम करने के लिए
कई सूरज मुझ में डूब गए मिरा साया कम करने के लिए

दुनिया के मनाज़िर ज़हर-बुझे सब मैं ने बसाए आँखों में
मिरी एक नज़र ही काफ़ी है तिर्याक़ को सम करने के लिए

इक इक लहज़ा सौ साल का था उजलत में न पूछ सखी क़िस्सा
ये वस्ल का काग़ज़ काफ़ी नही वो हिज्र रक़म करने के लिए

क्या जाने कितने जिस्म हवस की आग जले तब इश्क़ मिला
क्या जाने कितने दश्त उजड़े ता'मीर-ए-इरम करने के लिए

इक ख़्वाब हमारी आँखों में है रक़्स-कुनाँ सूफ़ी जैसा
हसरत से जुनूँ को तकता है सरगम मद्धम करने के लिए