उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zulm ki jo bhi mazammat nahin karne wale

ज़ुल्म की जो भी मज़म्मत नहीं करने वाले

ظلم کی جو بھی مذمت نہیں کرنے والے

शायर: Aafreen Faheem Aafi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ुल्म की जो भी मज़म्मत नहीं करने वाले
ऐसे लोगों की हम 'इज़्ज़त नहीं करने वाले

साथ ले आएगी फिर से कोई बिंत-ए-हव्वा
इस लिए ख़्वाहिश-ए-जन्नत नहीं करने वाले

आख़िरी साँस तलक टूट के चाहेंगे तुम्हें
'इश्क़ हम हस्ब-ए-ज़रूरत नहीं करने वाले

'इश्क़ में तेरी जगह और किसी को दे कर
हम अमानत में ख़यानत नहीं करने वाले

ख़्वाब आँखों के जिन्हें सौंप दिए हैं तुम ने
वो तो ख़्वाबों की हिफ़ाज़त नहीं करने वाले

हम से 'आफ़ी' जो मिलो मिलना ख़ुलूस-ए-दिल से
हम मुनाफ़िक़ की तो 'इज़्ज़त नहीं करने वाले