उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ziyaada kam ka kahan wo hisab rakhta hai

ज़ियादा कम का कहाँ वो हिसाब रखता है

زیادہ کم کا کہاں وہ حساب رکھتا ہے

शायर: Zafar Mirzapuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ियादा कम का कहाँ वो हिसाब रखता है
उजाला सब के लिए माहताब रखता है

वो देख लेता है हर शय को अपनी आँखों से
और अपने हुस्न को ज़ेर-ए-नक़ाब रखता है

जो ख़त को पढ़ लो मो'अत्तर दिमाग़ हो जाए
वो हर्फ़ हर्फ़ में बू-ए-गुलाब रखता है

ये और बात है ख़ामोश है वो मस्लहतन
जो हर सवाल का अच्छा जवाब रखता है

तुम उस के रंज को किस तरह जान पाओगे
सजा के रुख़ पे जो दिल की किताब रखता है

बग़ैर उस की इजाज़त के छू नहीं सकते
वो दाने दाने का अपने हिसाब रखता है

उसी को मिलती है ता'बीर-ए-नौ की शादाबी
जो अपनी आँखों में ख़ुश-रंग ख़्वाब रखता है

कोई शुमार नहीं उस का इस ज़माने में
जो गुफ़्तुगू में 'ज़फ़र' जी जनाब रखता है