उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barq ki zad mein jab aashiyana paDa

बर्क़ की ज़द में जब आशियाना पड़ा

برق کی زد میں جب آشیانہ پڑا

शायर: Zafar Mirzapuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बर्क़ की ज़द में जब आशियाना पड़ा
हौसला बढ़ गया मुस्कुराना पड़ा

आग शबनम की सूरत निहाँ जिन में है
ऐसे फूलों से दामन बचाना पड़ा

ज़िंदा रहने की ख़ातिर नए दौर में
बोझ अश्कों का तन्हा उठाना पड़ा

रात भर जो अँधेरों से लड़ते रहे
उन चराग़ों को दिन में बुझाना पड़ा

मुझ को पिंजरे के पंछी की याद आ गई
राह में जब कोई क़ैद-ख़ाना पड़ा

मोम के वास्ते घर उजाड़े गए
शहद की मक्खियों को उड़ाना पड़ा

ज़ब्त करता मगर जब वो मय्यत चली
सब के हम-राह आँसू बहाना पड़ा

शाख़ से गीत सब को सुनाता था जो
उस परिंदे पे किस का निशाना पड़ा

जब चराग़ों ने भी साथ छोड़ा 'ज़फ़र'
रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा