उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aur bhi kuchh log karb-e-zist se haare lage

और भी कुछ लोग कर्ब-ए-ज़ीस्त से हारे लगे

اور بھی کچھ لوگ کرب زیست سے ہارے لگے

शायर: Zafar Mirzapuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

और भी कुछ लोग कर्ब-ए-ज़ीस्त से हारे लगे
कुछ हमें तन्हा नहीं हालात के मारे लगे

बारहा ऐसा हुआ आँखें ही धोका खा गईं
फूल बेले के खिले थे और मुझे तारे लगे

बात जो दिल में थी चेहरा भी था उस का आइना
दोस्तों से भी कभी दुश्मन मिरे प्यारे लगे

कैफ़ियत दिल पर मिरे कुछ ऐसी तारी हो गई
शाख़ पर जब ख़ूब-सूरत फूल अंगारे लगे

नाम पर मज़हब के फैलाते हैं हम नफ़रत की आग
हम मुहज़्ज़ब शहरियों से अच्छे बंजारे लगे

यूँ दिल-ए-नादाँ मचल उठता है बच्चों की तरह
हर तमन्ना जैसे दिल को उड़ते ग़ुब्बारे लगे

हम सजा कर ये जरीदे घर में रखते हैं 'ज़फ़र'
मिस्ल-ए-दौलत हम क़लमकारों को फ़न-पारे लगे