उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aawara phiren kucha-e-dil-dar ke hote

आवारा फिरें कूचा-ए-दिल-दार के होते

آوارہ پھریں کوچۂ دل‌‌ دار کے ہوتے

शायर: Zafar Mirzapuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आवारा फिरें कूचा-ए-दिल-दार के होते
क्यूँ जाएँ कहीं हम तिरी दीवार के होते

दुनिया मुझे नादार समझती है तो समझे
क्यूँ फ़िक्र करूँ चश्म-ए-गुहर-बार के होते

तौहीन है ये दस्त-ए-दु'आ की मिरे नज़दीक
माँगे कोई कुछ और तिरे प्यार के होते

ये हाल तिरी बज़्म का देखा नहीं जाता
बाज़ार है वीरान ख़रीदार के होते

ये दौलत-ए-बेदाद कहाँ सब को मयस्सर
अब चाहिए क्या और ग़म-ए-यार के होते

फ़िक्र अपनी नहीं फ़िक्र है नामूस-ए-वफ़ा की
ये हाल हमारा तिरी सरकार के होते

क्या इस से सिवा होगी 'ज़फ़र' शूमी-ए-तक़दीर
बे-आसरा हम हैं निगह-ए-यार के होते