उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek tamasha jaan kar dil apna bahlane gae

इक तमाशा जान कर दिल अपना बहलाने गए

اک تماشا جان کر دل اپنا بہلانے گئے

शायर: Zafar Mirzapuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक तमाशा जान कर दिल अपना बहलाने गए
एक दीवाने को कितने लोग समझाने गए

'ऐश-ओ-ख़ुश-हाली के दिन में कोई बेगाना न था
शम' के बुझते ही उड़ कर सारे परवाने गए

पत्थरों के दरमियाँ थे या था सोहबत का असर
जौहरी की आँख से मेरे न पहचाने गए

भोर में ख़ुश हो के कितना झूमने लगता है पेड़
उस की जानिब कुछ परिंदे गीत जब गाने गए

डर है साक़ी की सख़ावत पर न आँच आए कहीं
मय-कदे से ले के ख़ाली कितने पैमाने गए

क्या ख़बर थी भूक के बा'इस फँसेंगे जाल में
खेत की जानिब परिंदे देख कर दाने गए

दर-हक़ीक़त चंद लोगों के यहाँ तसनीफ़ हैं
मीर-ओ-ग़ालिब के मगर हर घर में अफ़्साने गए

जब ख़बर फैली कि कश्ती फँस गई गिर्दाब में
शहर वाले घाट पर तफ़रीह फ़रमाने गए

ये किताबें ये रसाइल लाइब्रेरी में 'ज़फ़र'
कह रही हैं किस तरफ़ उर्दू के दीवाने गए