उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil mein kisi majbur ke jazbaat bandhe the

दिल में किसी मजबूर के जज़्बात बंधे थे

دل میں کسی مجبور کے جذبات بندھے تھے

शायर: Zafar Mirzapuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल में किसी मजबूर के जज़्बात बंधे थे
तर आँख थी होंटों पे सवालात बंधे थे

घर में था तिरे दम से उजाला ही उजाला
चेहरे के तिरे नूर से ज़ुल्मात बंधे थे

दुनिया की निगाहों का 'अजब जाल पड़ा था
करते भी तो किस तरह मुलाक़ात बंधे थे

कुछ सोच न पाए न क़लम हाथ में आया
ज़ंजीर में अश्कों के ख़यालात बंधे थे

एहसास था तहज़ीब का उठते भी तो कैसे
शो’रा की वो महफ़िल थी कि कल रात बंधे थे

इस हाल में नींद आँख में आती भी तो कैसे
यादों की तिरी डोर से कल रात बंधे थे

वो ट्रेन के डब्बे में 'अज़ीज़ों से घिरा था
भीगी हुई आँखों में सवालात बंधे थे

क्या क़द्र वहाँ होती 'ज़फ़र' दीदा-ए-तर की
रेशम में जहाँ सैकड़ों सौग़ात बंधे थे