उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi jabr-e-musalsal hai magar jari hai

ज़िंदगी जब्र-ए-मुसलसल है मगर जारी है

زندگی جبر مسلسل ہے مگر جاری ہے

शायर: Jaani Lakhnavi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी जब्र-ए-मुसलसल है मगर जारी है
यूँ समझिए के अज़ल से मिरी तय्यारी है

वही दीवार जहाँ दर कि थी ख़्वाहिश मुझ को
मैं ने दुनिया उसी दीवार पे दे मारी है

ये भी तक़दीर का एहसान के हम जैसे लोग
साँस भी खींचें तो लगता है अदा-कारी है

फिर वही हुस्न ने पर्दे को किया है रुस्वा
फिर वही तुर्फ़ा तमाशा वही 'अय्यारी है

तब भी ज़ालिम कि हिमायत में नहीं था 'जानी'
अब भी दरबार में लहजा मिरा इंकारी है