उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bachpan ke zaKHm ko kahin marham nahin mila

बचपन के ज़ख़्म को कहीं मरहम नहीं मिला

بچپن کے زخم کو کہیں مرہم نہیں ملا

शायर: Jaani Lakhnavi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बचपन के ज़ख़्म को कहीं मरहम नहीं मिला
उस पर मिरी जवानी को ग़म कम नहीं मिला

सहरा में हर किसी से नहीं होते मो'जिज़े
वो एड़ियाँ भी हैं जिन्हें ज़मज़म नहीं मिला

नुसरत का शौक़ था कि ये बाज़ू कटा दिए
लेकिन हमारे हाथ को परचम नहीं मिला

महरूमियों का मेरी भला क्या हिसाब हो
मुझ को तो मरने वाले का मातम नहीं मिला

तन्हाइयों की मारी हुई मैं इधर उधर
तस्वीर हूँ जिसे कोई एल्बम नहीं मिला

हर बार सफ़ से आगे निकल आए हम मगर
हम को किसी भी जंग में परचम नहीं मिला

दुनिया की भीड़ में हुए रुस्वा जहाँ गए
'जानी' नहीं मिला कोई हमदम नहीं मिला