उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zikr munh par bahaar jaisa hai

ज़िक्र मुँह पर बहार जैसा है

ذکر منہ پر بہار جیسا ہے

शायर: Kalim Akhtar8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िक्र मुँह पर बहार जैसा है
पीठ पीछे कटार जैसा है

सच का दामन बबूल की सूरत
झूट का फ़न चिनार जैसा है

ख़ुद को कब तक सँभाल कर रक्खें
अपना हम भी शिकार जैसा है

फूल काँटों में भी निकल आए
ज़ेहन लेकिन शरार जैसा है

जिस को देखो वो पूजता है इसे
वक़्त भी क्या मज़ार जैसा है

दफ़अ'तन मुझ पे आप का ये करम
शीशा-ए-दिल पे बार जैसा है

दर्द-ओ-ग़म क्यों न हों शरीक-ए-हयात
दिल का रिश्ता भी हार जैसा है

रोज़ देते हो फूल का तोहफ़ा
ये भी 'अख़्तर' उधार जैसा है