उर्दू शायरी · ग़ज़ल

Dhal gai raat kahkashan phir bhi

ढल गई रात कहकशाँ फिर भी

ڈھل گئی رات کہکشاں پھر بھی

शायर: Kalim Akhtar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ढल गई रात कहकशाँ फिर भी
तू नहीं तेरी दास्ताँ फिर भी

उम्र गुज़री है दश्त-ओ-सहरा में
हम को लगती है गुल्सिताँ फिर भी

चलते चलते ग़म-ए-फ़िराक़ का तीर
रोक लेता है ये कमाँ फिर भी

कर्ब की रात शो'ला-रू थी बहुत
सुब्ह-दम ग़म की दास्ताँ फिर भी

अब कोई आग भी नहीं 'अख़्तर'
तप रहा है मिरा मकाँ फिर भी