उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zist ke andhere mein raushni nahin aati

ज़ीस्त के अंधेरे में रौशनी नहीं आती

زیست کے اندھیرے میں روشنی نہیں آتی

शायर: Yasmeen Moomal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ीस्त के अंधेरे में रौशनी नहीं आती
याद आज-कल मुझ को आप की नहीं आती

मौत से बहुत पहले लोग मरते देखे हैं
रास हर किसी को ये ज़िंदगी नहीं आती

आइना हूँ उल्फ़त का मैं इसी लिए मुझ को
दोस्ती तो आती है दुश्मनी नहीं आती

आप जैसे करते हैं भूल कर ज़माने को
उस तरह मुझे करनी बंदगी नहीं आती

जो भी काम करते हैं दिल लगा के करते हैं
आप की क़सम हम को दिल-लगी नहीं आती

जब तलक शजर को हम सींचते नहीं जड़ तक
तब तलक तो उस में भी ताज़गी नहीं आती

कर दिया है ज़ख़्मों ने 'यासमीं' का दिल पत्थर
मुस्कुराते होंटों पर अब हँसी नहीं आती