उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zist kam lagti thi dushwar ziyaada nikli

ज़ीस्त कम लगती थी दुश्वार ज़ियादा निकली

زیست کم لگتی تھی دشوار زیادہ نکلی

शायर: Umair Najmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ीस्त कम लगती थी दुश्वार ज़ियादा निकली
मेरे अंदाज़ से हर बार ज़ियादा निकली

कोई रौज़न न झरोका न कोई दरवाज़ा
मेरी ता'मीर में दीवार ज़ियादा निकली

ये मिरी मौत के अस्बाब में लिक्खा होगा
ख़ून में 'इश्क़ की मिक़दार ज़ियादा निकली

कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और साया
मुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली

तू समझता था मुझे तू ने ही बरता है 'उमैर'
ज़िंदगी तुझ से भी फ़नकार ज़ियादा निकली