उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aql ko lae ba-ru-e-kar pagal ho gae

'अक़्ल को लाए ब-रू-ए-कार पागल हो गए

عقل کو لائے بہ روئے کار پاگل ہو گئے

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अक़्ल को लाए ब-रू-ए-कार पागल हो गए
'इश्क़ को समझा समझ कर यार पागल हो गए

एक पागल होश में आया और इक सिसकी भरी
आइने टूटे दर-ओ-दीवार पागल हो गए

जब हवा खिड़की को ठोकर मार कर अन्दर घुसी
मेज़ पर कुछ तह लगे अख़बार पागल हो गए

आसमाँ से एक शब उतरा त'अल्लुक़ का ग़ुबार
उस घड़ी जो लोग थे बेदार पागल हो गए

कुछ मुसल्लह शख़्स रक्खे थे कि पागलपन न हो
एक दिन वो अस्लहा-बरदार पागल हो गए

एक दिन बस उस से ऊँचे सुर में गाने को कहा
फिर सुना है सुन के मौसीक़ार पागल हो गए

वो हमारे हाल से ला-'इल्म है अब तक 'उमैर'
सब जुनूँ ज़ाए' हुआ बेकार पागल हो गए