उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baghban mujhse KHafa tha be-samar hota tha main

बाग़बाँ मुझ से ख़फ़ा था बे-समर होता था मैं

باغباں مجھ سے خفا تھا بے ثمر ہوتا تھا میں

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाग़बाँ मुझ से ख़फ़ा था बे-समर होता था मैं
था तो पहला पेड़ पर आख़िर में तर होता था मैं

जो गुज़रता पास से मेरे वो टकराता ज़रूर
इस क़दर दिखता नहीं था जिस क़दर होता था मैं

कुछ न कुछ होता है सब में मैं था सब का सब ख़ला
उस जगह कुछ भी न होता था जिधर होता था मैं

फिर उसी हालत का नाम इक रोज़ हैरानी पड़ा
रोज़ जिस हालत में उस को देख कर होता था मैं

उन दिनों मैं और वीरानी थे बिल्कुल एक शय
सब चले जाते थे घर से और घर होता था मैं

तेरे होते और भी कुछ हो ये ना-मुम्किन था सो
कुछ न होना होना मुश्किल था मगर होता था मैं

मुझ से हो कर सब निगाहें उस पे टिक जातीं 'उमैर'
वो मुज़य्यन कमरा और शीशे का दर होता था मैं