उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ba-waqt-e-asr jab ashya ke sae baDhne lage

ब-वक़्त-ए-'अस्र जब अश्या के साए बढ़ने लगे

بوقت عصر جب اشیا کے سایہ بڑھنے لگے

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ब-वक़्त-ए-'अस्र जब अश्या के साए बढ़ने लगे
हम इक मकाँ की तरफ़ सर झुकाए बढ़ने लगे

किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने
फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे

मैं चाहता हूँ कि अब हम समुंदरों के बीच
ज़मीं निगलती कोई आबनाए बढ़ने लगे

फिर आज घर से निकल कर नई थकन की तरफ़
पुराने दिन की थकन को उठाए बढ़ने लगे

थी तर्क-ए-निस्बत-ओ-तरका में निस्बत-ए-मा'कूस
सो जाएदाद घटी तो पराए बढ़ने लगे

मैं चाहता हूँ तू मेरे ख़िलाफ़ बोला कर
मैं चाहता हूँ तिरे हक़ में राय बढ़ने लगे

किसी भी शय का जुनूँ भूख की तरह है 'उमैर'
कि इस को जितना भी कोई बढ़ाए बढ़ने लगे