उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zara lau charagh ki kam karo mera dukh hai phir se utar par

ज़रा लौ चराग़ की कम करो मिरा दुख है फिर से उतार पर

ذرا لو چراغ کی کم کرو مرا دکھ ہے پھر سے اتار پر

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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ज़रा लौ चराग़ की कम करो मिरा दुख है फिर से उतार पर
जिसे सुन के अश्क छलक पड़ें वही धुन बजाओ सितार पर

ज़रा हैरतों से निकल तो लूँ ज़रा होश आए तो कुछ कहूँ
अभी कुछ न पूछ कि क्या हुआ मिरा ध्यान अभी है ग़ुबार पर

कहीं हर्फ़-हर्फ़ गुलाब है कहीं ख़ुशबुओं से ख़िताब है
मैं ख़िज़ाँ-नसीब सही मगर मिरा तब्सिरा है बहार पर

मिरी कल्पना ने छुआ फ़लक मिरी दस्तरस में है अब धनक
तिरी याद ने तिरी आस ने मुझे दे दिए हैं हज़ार पर

मिरे दोस्त तुझ को है क्या पता तुझे दे रहे हैं जो मशवरा
यही लोग जश्न मनाएँगे मिरी जीत पर तिरी हार पर

जहाँ हरसिंगार फ़ुज़ूल हों जहाँ उगते सिर्फ़ बबूल हों
जहाँ ज़र्द रंग हो घास का वहाँ क्यों न शक हो बहार पर