उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zar na baKHsha na sahi chashm-e-guhar-bar sahi

ज़र न बख़्शा न सही चश्म-ए-गुहर-बार सही

زر نہ بخشا نہ سہی چشم گہر بار سہی

शायर: Zafar Mirzapuri10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़र न बख़्शा न सही चश्म-ए-गुहर-बार सही
'इश्क़ प्यारा है बहुत क़ल्ब का आज़ार सही

कुछ न कुछ घर में असासा मिरे मौजूद तो है
दौलत-ए-दहर नहीं दौलत-ए-अफ़्कार सही

ग़म-ओ-अंदोह-ए-मसाइब से भरी है दुनिया
मुझे प्यारी नज़र आती है सितम-गार सही

जश्न-ए-दीवाली मना लेते हैं हर शब जुगनू
क़ैद-ख़ाने में सियाही के गिरफ़्तार सही

तिरा वहशी तिरे कूचे में यही कहता था
साया-ए-ज़ुल्फ़ नहीं साया-ए-दीवार सही

बज़्म-ए-फ़नकार में आया पए-तौक़ीर कोई
रहबर-ए-शहर नहीं गाँव का सरदार सही

कोई 'आलम हो मगर हँस के जिए जाते हैं
वादी-ए-गुल न सही वादी-ए-पुर-ख़ार सही

इस मोहब्बत ने दिया हौसला दिल को मेरे
राह आसाँ न सही मंज़िल-ए-दुश्वार सही

बड़ी उम्मीद है अल्लाह से बख़्शिश की हमें
हम ज़माने की निगाहों में गुनह-गार सही

मुफ़लिसी क़ैद किए है मगर हसरत है 'ज़फ़र'
इक नज़र देख तो लें रौनक़-ए-बाज़ार सही