उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamir-o-zehan se ki hain baghawaten kya kya

ज़मीर-ओ-ज़ेहन से की हैं बगावतें क्या क्या

ضمیر و ذہن سے کی ہیں بغاوتیں کیا کیا

शायर: Lais Quraishi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़मीर-ओ-ज़ेहन से की हैं बगावतें क्या क्या
मुनाफ़िक़ों से निभाईं रिफाक़तें क्या क्या

हयात अर्सा-ए-कर्ब-ओ-बला में गुज़री है
तमाम-उम्र हुई हैं शहादतें क्या क्या

किसी से प्यार किसी से वफ़ा किसी से ख़ुलूस
बिगड़ गई हैं हमारी भी आदतें क्या क्या

ये जब्र है कि ग़रज़ से ग़रज़ बदलते हैं
हमें अज़ीज़ थीं वर्ना शराफ़तें क्या क्या

मिज़ाज-ए-वक़्त ने छीना है मुझ से मेरा मिज़ाज
गुज़रती रहती हैं दिल पर क़यामतें क्या क्या

सबा पे हर्फ़ न आए किरन का दिल न दुखे
शगुफ़्ता गुल के लिए हैं नज़ाकतें क्या क्या

ये और बात समझने से हम हैं क़ासिर 'लैस'
जबीन-ए-वक़्त पर देखीं इबारतें क्या क्या