उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-qasd safar jate hain malum nahin kyun

बे-क़स्द सफ़र जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

بے قصد سفر جاتے ہیں معلوم نہیں کیوں

शायर: Lais Quraishi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-क़स्द सफ़र जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ
फिर ख़ुद ही ठहर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

हम प्यार से जीने की दुआ देते हैं जिन को
वो लोग भी मर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

कुछ लोग तुझे देख के ऐ फ़स्ल-ए-बहाराँ
बा-दीदा-ए-तर जाते हैं मालूम नहीं क्यूँ

इक वहम समझते थे हक़ीक़त को जो कल तक
अब ख़्वाब से डर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

उतरे हुए चेहरों को भी ये कहते सुना है
कुछ हम से भी डर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

इक सिलसिला अश्क है शबनम मगर इस से
गुलज़ार निखर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

मंज़िल की तरफ़ राह-ए-मोहब्बत के मुसाफ़िर
बे-रख़्त-ए-सफ़र जाते हैं मालूम नहीं क्यूँ

कुछ देख के कुछ सोच के कुछ लोग जहाँ से
चुप-चाप गुज़र जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

कश्ती को डुबो कर उसी कश्ती के मुहाफ़िज़
ख़ुद पार उतर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

घर में कोई आराम की सूरत नहीं फिर भी
थक-हार के घर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ

हाँ अक्स-ए-रुख़-ए-संग-ज़दा से भी तो ऐ 'लैस'
आईने सँवर जाते हैं मा'लूम नहीं क्यूँ