उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barha yurish-e-afkar ne sone na diya

बारहा यूरिश-ए-अफ़्कार ने सोने न दिया

بارہا یورش افکار نے سونے نہ دیا

शायर: Lais Quraishi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बारहा यूरिश-ए-अफ़्कार ने सोने न दिया
फ़िक्र आज़ाद है आज़ार ने सोने न दिया

बंद थीं दाएरा-ए-ख़्वाब में आँखें अपनी
फ़िक्र की गर्दिश-ए-पर्कार ने सोने न दिया

थी तसव्वुर में निहाँ-ख़ाना-ए-दिल की तस्वीर
रात-भर दीदा-ए-बेदार ने सोने न दिया

मुझ से थे बर-सर-ए-पैकार मिरे ज़ेहन-ओ-ज़मीर
मुझ को बेदारी-ए-किरदार ने सोने न दिया

कोई मंज़र था कि था मंज़र-ए-रंगीं का फ़रेब
क्या कहीं ख़्वाब-ए-पुर-असरार ने सोने न दिया

मुझ पे इस तरह से रौशन थी हक़ीक़त अपनी
उम्र-भर चश्म-ए-ख़बर-दार ने सोने न दिया

मैं ने कुछ धूप में जलते हुए चेहरे देखे
फिर मुझे साया-ए-दीवार ने सोने न दिया

रात-भर बारिश-ए-इल्हाम रही है दिल पर
सुब्ह तक अब्र-गुहर-बार ने सोने न दिया

'लैस' मौज़ू-ए-सुख़न फ़िक्र-ए-बशर थी हम थे
और फिर गर्मी-ए-गुफ़्तार ने सोने न दिया