उर्दू शायरी · ग़ज़ल

itni mushkil mein bhi ahbab na Dalen mujhko

इतनी मुश्किल में भी अहबाब न डालें मुझ को

اتنی مشکل میں بھی احباب نہ ڈالیں مجھ کو

शायर: Lais Quraishi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इतनी मुश्किल में भी अहबाब न डालें मुझ को
कि सँभलना भी न चाहूँ तो सँभालें मुझ को

ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-जाँ एक हुए
डर रहा हूँ ये कहीं मार न डालें मुझ को

मुनफ़रिद मेरी तबीअत है ये हालात कहीं
रविश-ए-आम के साँचे में न ढालें मुझ को

मैं तो इस पर भी हूँ राज़ी कि तिरे शहर के लोग
मेरे बनते नहीं अपना ही बना लें मुझ को

आप मुझ से किसी ता'बीर की फिर बात करें
पहले इस ख़्वाब-ए-तमन्ना से जगा लें मुझ को

नहीं मा'लूम कि कल तक मैं रहूँ या न रहूँ
मेहरबाँ आज ही जी-भर के सता लें मुझ को

गर्दिशों के लिए अब तक न ये मुमकिन न हुआ
किसी सूरत मिरे मेहवर से हटा लें मुझ को

इन बुलंदी के मकीनों को मयस्सर ही नहीं
'लैस' वो हाथ जो पस्ती से उठा लें मुझ को