उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo ittifaq se hum sahab-e-farash hue

जो इत्तिफ़ाक़ से हम साहब-ए-फ़राश हुए

جو اتفاق سے ہم صاحب فراش ہوئے

शायर: Lais Quraishi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो इत्तिफ़ाक़ से हम साहब-ए-फ़राश हुए
तो हम पे राज़-ए-अज़ीज़ाँ भी ख़ूब फ़ाश हुए

हम आइना तो नहीं फिर भी रात बिस्तर पर
गिरे जो आ के तो गिरते ही पाश-पाश हुए

किसे सुनाइए आज़ादगान-ए-शहर का हाल
कि रफ़्ता-रफ़्ता सभी कुश्ता-ए-मआश हुए

न पूछ अश्क-ए-रिया-कार का मआल ऐ दोस्त
वो अश्क तो रुख़-ए-एहसास की ख़राश हुए

तमाम उम्र तलाश-ए-सुकूँ रही हम को
तमाम उम्र न आसूदा-ए-तलाश हुए

कहाँ की नग़्मा-सराई कि साज़-ए-हस्ती के
तमाम तार ही महरूम-ए-इर्तिआ'श हुए

जनाब-ए-'लैस' जो अहबाब से गुरेज़ाँ थे
ये इंक़लाब तो देखो कि यार-बाश हुए