उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamin pe jab kabhi jalwe nazar ke dekhte hain

ज़मीं पे जब कभी जल्वे नज़र के देखते हैं

زمیں پہ جب کبھی جلوے نظر کے دیکھتے ہیں

शायर: Naeem Sahil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़मीं पे जब कभी जल्वे नज़र के देखते हैं
हम आसमान से अक्सर उतर के देखते हैं

बला का हुस्न है उस की सुबुक अदाओं में
जो बे-नियाज़ हैं वो भी ठहर के देखते हैं

ये हौसला है हमारा कि बाल-ओ-पर अपने
उड़ान भरने से पहले कतर के देखते हैं

ज़रूर दिल में कोई ख़्वाहिश-ए-सफ़र होगी
वो बार-बार हमें क्यों सँवर के देखते हैं

उन्ही को मिलती है हर गाम पे नई मंज़िल
तमाम 'उम्र जो इम्काँ सफ़र के देखते हैं

वो ना-तवाँ हो या ग़ाज़ी या अहल-ए-सर्वत हो
तमाम लोग तुम्हें आह भर के देखते हैं

जिसे ज़माना समझता है पुर-ख़तर 'साहिल'
हम ऐसी राह से अक्सर गुज़र के देखते हैं