उर्दू शायरी · ग़ज़ल

faza dushwar-e-jaan ho to mohabbat aur baDhti hai

फ़ज़ा दुश्वार-ए-जाँ हो तो मोहब्बत और बढ़ती है

فضا دشوار جاں ہو تو محبت اور بڑھتی ہے

शायर: Naeem Sahil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़ज़ा दुश्वार-ए-जाँ हो तो मोहब्बत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है

गिले-शिकवे चलो मिल बैठ कर सब दूर हम कर लें
निगाहें फेर लेने से कुदूरत और बढ़ती है

हमारा मशवरा अहल-ए-जहाँ को रास क्यों आए
बुरा जब वक़्त होता है हिमाक़त और बढ़ती है

किसी मज़लूम के हक़ में कभी सच बोल कर देखो
हर इक इंसान की नज़रों में 'इज़्ज़त और बढ़ती है

हमें आगाह करता है हमेशा ही बुराई से
ख़िलाफ़-ए-क़ल्ब जाने पर नदामत और बढ़ती है

यूँ कहने को हज़ारों लोग कहते हैं ग़ज़ल लेकिन
सलीक़े से कही जाए तो शोहरत और बढ़ती है

ख़मोशी बुज़दिली की है 'अलामत इस लिए 'साहिल'
'अदू के ज़ुल्म ढाने की जसारत और बढ़ती है