उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hasrat-e-dida-e-shab-tab liye baiThe hain

हसरत-ए-दीदा-ए-शब-ताब लिए बैठे हैं

حسرت دیدۂ شب تاب لئے بیٹھے ہیں

शायर: Naeem Sahil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हसरत-ए-दीदा-ए-शब-ताब लिए बैठे हैं
अपनी आँखों में हम इक ख़्वाब लिए बैठे हैं

शहर-ए-हस्ती में कुछ ऐसे भी हमें लोग मिले
अपनी फ़ितरत में जो गिर्दाब लिए बैठे हैं

हम ने ख़ुद को भी खंगाला है समुंदर की तरह
हाथ में गौहर-ए-नायाब लिए बैठे हैं

मुझ पे अल्लाह की रहमत है जो ज़िंदा हूँ मैं
वर्ना ख़ंजर मिरे अहबाब लिए बैठे हैं

हक़-बयानी से जो डरते हैं सर-ए-महफ़िल वो
ज़ेहन में मिम्बर-ओ-मेहराब लिए बैठे हैं

ज़ो'म ये है कि उन्हीं को ही मिलेगी जन्नत
जो तबाही के हर अस्बाब लिए बैठे हैं

दर्द क्या समझेंगे 'साहिल' वो सियह रातों का
अपने पहलू में जो महताब लिए बैठे हैं