उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab kabhi apni tamannaon ka gulshan dekha

जब कभी अपनी तमन्नाओं का गुलशन देखा

جب کبھی اپنی تمناؤں کا گلشن دیکھا

शायर: Naeem Sahil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब कभी अपनी तमन्नाओं का गुलशन देखा
मैं ने दिल-सोज़ ज़माने को भी दुश्मन देखा

अपने बारे में ग़लत-फ़हमी हुई है जब भी
मैं ने हर बार पुराना कोई दर्पन देखा

इस क़दर खोया हुआ था मैं तिरी यादों में
सहरा देखा न कभी राह में गुलशन देखा

कैफ़ियत दिल की बयाँ करती थीं आँखें सब की
मैं ने हर शख़्स का भीगा हुआ दामन देखा

दुश्मनी में भी मोहब्बत से वो पेश आता है
उस के जैसा न कोई दोस्त न दुश्मन देखा

हो गया उस की मैं 'अज़्मत का जहाँ में क़ाइल
जब कहीं भी किसी दाना को फ़िरोतन देखा

तेरा शैदाई हूँ मैं रोज़-ए-अज़ल से 'साहिल'
ज़िंदगी तुझ को हर इक दौर में अहसन देखा