उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamin nahin thi zamin par koi makan nahin tha

ज़मीं नहीं थी ज़मीं पर कोई मकाँ नहीं था

زمیں نہیں تھی زمیں پر کوئی مکاں نہیں تھا

शायर: Umr Daraz Hashir7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़मीं नहीं थी ज़मीं पर कोई मकाँ नहीं था
मैं उन दिनों भी कहीं था जब आसमाँ नहीं था

कुछ इस लिए भी मुसाफ़िर भटक नहीं पाए
कि उन के साथ कोई मीर-ए-कारवाँ नहीं था

अजीब शोर था जो उठ रहा था सीने से
अजीब आग थी जिस का कोई धुआँ नहीं था

मैं चाहता हूँ जिसे वो भी चाहता है मुझे
यक़ीं करो मुझे इस बात का गुमाँ नहीं था

वो कोई और था जो तुम से बात कर रहा था
वो लफ़्ज़ मेरे थे लेकिन मिरा बयाँ नहीं था

वगर्ना मुझ को भी कछवे से मात हो जाती
हज़ार शुक्र कि रस्ते में साएबाँ नहीं था

बिछड़ते वक़्त जो वापस बुला रहा था मुझे
वो मेरे लौट के आने पे शादमाँ नहीं था