उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kal bichhaDte hue zabt ka marhala is qadar talKH tha kya bataun aKHi

कल बिछड़ते हुए ज़ब्त का मरहला इस क़दर तल्ख़ था क्या बताऊँ अख़ी

کل بچھڑتے ہوئے ضبط کا مرحلہ اس قدر تلخ تھا کیا بتاؤں اخی

शायर: Umr Daraz Hashir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कल बिछड़ते हुए ज़ब्त का मरहला इस क़दर तल्ख़ था क्या बताऊँ अख़ी
मेरी ख़ामोशियों की चटानों के अंदर थी मेरी सदा क्या बताऊँ अख़ी

तू अभी रौशनी और अंधेरे में क्या फ़र्क़ है इस से बिल्कुल भी वाक़िफ़ नहीं
एक बुझते दिए की जो मजबूर किरनों ने मुझ से कहा क्या बताऊँ अख़ी

वक़्त के कैनवस पर बनी इस बरहना सी बे-रंग तस्वीर में देख लो
उन दिनों इस ख़यालों के जंगल में मेरे सिवा कौन था क्या बताऊँ अख़ी

शायरी और मोहब्बत के सब ज़ाविए ऐसे लोगों की आँखों पे खुलते नहीं
उम्र-भर जिन के हिस्से में आता नहीं लम्स का ज़ाइक़ा क्या बताऊँ अख़ी

ख़्वाब पेड़ों की सूरत हैं और ये कभी ख़ुश्क-ओ-बंजर ज़मीनों में उगते नहीं
इस लिए नींद से भागने वालों को ख़्वाब का फ़ल्सफ़ा क्या बताऊँ अख़ी