उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamane bhar ko nai tab-o-tab dikha na sake

ज़माने भर को नई ताब-ओ-तब दिखा न सके

زمانے بھر کو نئی تاب و تب دکھا نہ سکے

शायर: Gauhar Shaikh Purwi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़माने भर को नई ताब-ओ-तब दिखा न सके
वो शख़्स क्या जो ग़मों में भी मुस्कुरा न सके

हम अपने शहर में रहते हैं अजनबी की तरह
मगर ये बात किसी को भी हम बता न सके

गुज़रते वक़्त की मानिंद है आज का इंसाँ
सदाएँ दे के उसे हम कभी बुला न सके

ज़रूर रंजिश-ए-बेजा है आप को हम से
मिले गले से मगर दिल कभी मिला न सके

तुम्हारे वा'दे हसीं भी थे दिल-फ़रेब भी थे
हमारे घर से ग़रीबी मगर हटा न सके

जो बख़्शते रहे दुनिया को नूर की दौलत
वो अपने घर में कोई शम्अ तक जला न सके

रहे हैं 'गौहर'-ए-नायाब की तरह लेकिन
हम अपने आप को शोकेस में सजा न सके