उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har mausam-e-tapan mein gul-e-tar luTaiye

हर मौसम-ए-तपाँ में गुल-ए-तर लुटाइए

ہر موسم تپاں میں گل تر لٹائیے

शायर: Gauhar Shaikh Purwi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर मौसम-ए-तपाँ में गुल-ए-तर लुटाइए
जब लोग तिश्ना-लब हों समुंदर लुटाइए

कहता है हर्फ़-ए-दोस्ती अब भी पुकार के
घर में किसी के आप न पत्थर लुटाइए

महलों में क़हक़हों की है बरसात रोज़-ओ-शब
ख़ुशियाँ कभी तो मेरे भी दर पर लुटाइए

जब आप हो के शहर-ए-फ़रोज़ाँ से आए हैं
तारीकियों में नूर की चादर लुटाइए

अहबाब चाट जाएँगे दीमक की शक्ल में
अब दौलत-ए-ख़ुलूस भी बच कर लुटाइए

ज़ेहनों को ताज़ा-कार बनाने के वास्ते
शेर-ओ-सुख़न के फूल बराबर लुटाइए

'गौहर' है बे-बिसात अभी शहर-ए-फ़िक्र में
इक दिन मता-ए-इल्म भी इस पर लुटाइए