उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek pal bhi kahin rahat-o-aram nahin hai

इक पल भी कहीं राहत-ओ-आराम नहीं है

اک پل بھی کہیں راحت و آرام نہیں ہے

शायर: Gauhar Shaikh Purwi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक पल भी कहीं राहत-ओ-आराम नहीं है
ये इश्क़ का आग़ाज़ है अंजाम नहीं है

डरता हूँ कि गर्दिश न ज़माने की ठहर जाए
अब हाथ में सूरज है मिरे जाम नहीं है

क्या लूट लिया रिंदों ने मय-ख़ाना ही सारा
या मेरी ही क़िस्मत में कोई जाम नहीं है

जिस पाप की दुनिया में है रावन का बसेरा
उस स्वर्ग सी धरती पे कोई राम नहीं है

मैं ने ही निखारा है तिरा रंग-ए-मोहब्बत
और मेरा तिरी बज़्म में कुछ काम नहीं है

तुम ने ही सितम ढाए हैं तुम ने ही जफ़ा की
मैं कैसे कहूँ तुम पे कुछ इल्ज़ाम नहीं है

सब कुछ है जब अपना ही तो मैं सोच रहा हूँ
इंसान को क्यों पहला सा आराम नहीं है

मेरे ही गुनाहों पे नज़र क्यों है जहाँ की
है कौन जो इस दौर में बदनाम नहीं है

हैरत है कि तू उस को नहीं जानता लेकिन
इस शहर में 'गौहर' कोई गुम-नाम नहीं है