उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaKHm jab dil ke pasandida nahin hote the

ज़ख़्म जब दिल के पसंदीदा नहीं होते थे

زخم جب دل کے پسندیدہ نہیں ہوتے تھے

शायर: Dawood Syed6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ख़्म जब दिल के पसंदीदा नहीं होते थे
मसअले इतने भी पेचीदा नहीं होते थे

अब किसी क़ब्र को बैठे हैं ग़ज़ल-गाह किए
सब की नज़रों में जो संजीदा नहीं होते थे

जुज़्वी तक़्सीम किया था ग़म-ए-दौराँ ने हमें
चीदा होते थे जहाँ चीदा नहीं होते थे

नज़र आ जाता था असग़र का लहू मक़्तल में
हाशमी यूँही तो नम-दीदा नहीं होते थे

तह-ब-तह खुलते थे इस आँख में दुनिया के वुजूद
राज़ इस जिस्म में पोशीदा नहीं होते थे

जादुई ज़ुल्फ़ मयस्सर थी मिरे फूलों को
मुद्दतों बा'द भी बोसीदा नहीं होते थे