उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ba-rang-e-jaun hi nikhri ghuTan aahista aahista

ब-रंग-ए-'जौन' ही निखरी घुटन आहिस्ता आहिस्ता

بہ رنگ جونؔ ہی نکھری گھٹن آہستہ آہستہ

शायर: Dawood Syed6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ब-रंग-ए-'जौन' ही निखरी घुटन आहिस्ता आहिस्ता
नज़र आने लगा बाम-ए-सुख़न आहिस्ता आहिस्ता

वो कहती थी मोहब्बत वहम है ख़ाली दिमाग़ों का
उसे लगता था भर जाएगा मन आहिस्ता आहिस्ता

ख़लल ले आई आख़िर 'इश्क़ में ये सह्ल-अंगारी
बदलने लग गए उस के चलन आहिस्ता आहिस्ता

मिरे होंटों से उस का नाम क्या निकला ग़ज़ल निकली
कि जैसे चल पड़े कोई हिरन आहिस्ता आहिस्ता

बहुत से लोग आवाज़ें लगाने से नहीं रुकते
कफ़न हो जाता है हर पैरहन आहिस्ता आहिस्ता

फिर इक दिन आएगा मैं हिज्र को तस्लीम कर लूँगा
बदल जाएगा मिट्टी में बदन आहिस्ता आहिस्ता