उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zahr se zahr kaTe kanTe se kirchi nikle

ज़हर से ज़हर कटे काँटे से किरची निकले

زہر سے زہر کٹے کانٹے سے کرچی نکلے

शायर: Vibha Jain 'Khwaab'7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़हर से ज़हर कटे काँटे से किरची निकले
दे नया दर्द कि ये टीस पुरानी निकले

ज़िंदगी यूँ तो नया लफ़्ज़ नहीं है लेकिन
वक़्त के साथ नए इस के म'आनी निकले

क्यों कोई कोख जो सूनी हो वो शर्मिंदा हो
क्या ज़रूरी है कि हर सीप से मोती निकले

'इश्क़ की झील में उतरो तो सँभल कर उतरो
'ऐन मुमकिन है ये उम्मीद से गहरी निकले

एक वो शख़्स जिसे दिल ने ख़ुदा जाना हो
सोचिए क्या हो अगर वो भी फ़रेबी निकले

छटपटाते हैं उदासी से निकलने को मगर
क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले

वो तरीक़ा मुझे मरने का बताओ जिस से
ख़ुद-कुशी भी न लगे जान भी जल्दी निकले