उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankhon ko chubhne lagta hai sab miTTi ho jata hai

आँखों को चुभने लगता है सब मिट्टी हो जाता है

آنکھوں کو چبھنے لگتا ہے سب مٹی ہو جاتا ہے

शायर: Vibha Jain 'Khwaab'5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँखों को चुभने लगता है सब मिट्टी हो जाता है
ख़्वाब चटक कर रेज़ा रेज़ा जब मिट्टी हो जाता है

एक किसान ख़ुदा से आख़िर माँगे भी तो क्या माँगे
बन कर मेघ बरस जाता है रब मिट्टी हो जाता है

तेरे हिज्र की आग में आहिस्ता आहिस्ता जल जल कर
मोम बदन थोड़ा थोड़ा हर शब मिट्टी हो जाता है

आँखों से लहरें उठती हैं खारे खारे अश्कों की
और हर क़तरा आँसू का बर-लब मिट्टी हो जाता है

दिल भी एक सितारा है जो टूट रहा है क़िस्तों में
रोज़ तिरी ख़्वाहिश में बे-मतलब मिट्टी हो जाता है