उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zahr-e-saat hi piyen jism tah-e-KHak to ho

ज़हर-ए-साअत ही पिएँ जिस्म तह-ए-ख़ाक तो हो

زہر ساعت ہی پئیں جسم تہ خاک تو ہو

शायर: Zafar Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़हर-ए-साअत ही पिएँ जिस्म तह-ए-ख़ाक तो हो
सर्द आँखों में कोई ख़्वाहिश-ए-नापाक तो हो

हम भी रौशन हों उतारें ये गुनाहों का लिबास
तू बरसते हुए पानी की तरह पाक तो हो

मुंजमिद ख़ून रगों का है इसे पी जाएँ
रात का ज़ख़्म-ए-सियह-रंग जिगर-चाक तो हो

जिस्म-ए-ख़ाकी से भी तनवीर का रिश्ता है ज़रूर
सुर्ख़ शो'लों से लिपट जा ख़स-ओ-ख़ाशाक तो हो

आज फिर ज़ेहन की शाख़ों पे हैं शो'लों के गुलाब
चशम-ए-संग उन को भी देखे ज़रा नमनाक तो हो