उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis jagah rahna samundar rahna

जिस जगह रहना समुंदर रहना

جس جگہ رہنا سمندر رہنا

शायर: Zafar Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस जगह रहना समुंदर रहना
और प्यासों को मयस्सर रहना

पाँव चादर से न बाहर निकले
अपनी औक़ात के अंदर रहना

घर से महरूम न कर दे तुम को
ये शब-ओ-रोज़ का बाहर रहना

अपने पैरों पे खड़े हो जाओ
कब तलक बोझ किसी पर रहना

तुम को दावा है दिलेरी का अगर
ना-तवाँ लोग से दब कर रहना

सब को होती है नशेमन की तलब
चाहता कौन है बे-घर रहना

मुझ पे आसेब है नादारी का
तुम मिरे साए से बच कर रहना

ये तो काँटों का मुक़द्दर है 'ज़फ़र'
फूल के पास बराबर रहना