उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamam shahr mein koi bhi ru-shanas na tha

तमाम शहर में कोई भी रू-शनास न था

تمام شہر میں کوئی بھی روشناس نہ تھا

शायर: Zafar Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तमाम शहर में कोई भी रू-शनास न था
ख़ता यही थी कि लहजा पुर-इल्तिमास न था

फिर उस ने किस लिए रक्खे हवा पे अपने क़दम
वो गर्द गर्द था सूखे लबों की प्यास न था

मैं अपने आप लुटा आसमाँ की ख़्वाहिश से
ज़मीं का चेहरा मिरी नींद से उदास न था

ये किस ने आँख को नंगा किया है दरिया में
महकती रेत पे कोई भी बे-लिबास न था

उदास हो के सजा कार्नस के पत्थर पर
ज़मीं पे टूट के गिरता मैं वो गिलास न था