उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab to wo shaKHs zamane mein asar rakhta hai

अब तो वो शख़्स ज़माने में असर रखता है

اب تو وہ شخص زمانے میں اثر رکھتا ہے

शायर: Zafar Siddiqui6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब तो वो शख़्स ज़माने में असर रखता है
दस से जो बीस बनाने का हुनर रखता है

अपने किरदार से होती है शिकायत जिस को
अपने बच्चों पे बड़ी सख़्त नज़र रखता है

वक़्त के साथ न बदला मिरे क़ातिल का मिज़ाज
आज भी होंट मिरे ख़ून से तर रखता है

उस को भी लोग अँधेरों से डराने निकले
दस्तरस में जो कई शम्स-ओ-क़मर रखता है

अब का इंसान है ऐसा कि यक़ीन आता नहीं
मर्तबा ऊँचा फ़रिश्तों से बशर रखता है

अब के बौछार बहुत होगी 'ज़फ़र' तीरों से
वो चले साथ जो पत्थर का जिगर रखता है