उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahan kar dast-o-pa mein aahani zewar nikalte hain

पहन कर दस्त-ओ-पा में आहनी ज़ेवर निकलते हैं

پہن کر دست و پا میں آہنی زیور نکلتے ہیں

शायर: Zafar Siddiqui6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहन कर दस्त-ओ-पा में आहनी ज़ेवर निकलते हैं
तिरे वहशी ब-सू-ए-दार बन-ठन कर निकलते हैं

बग़ावत की हवा जब भी दिखाती है असर अपना
तो फिर संजीदा लोगों में भी कुछ ख़ुद-सर निकलते हैं

कोई मुझ को ये बतलाए कि उजले पैरहन वाले
अँधेरी रात के आलम में क्यूँ बाहर निकलते हैं

जिन्हें दावा है गुलशन में गुलों की पासबानी का
पस-ए-पर्दा वही फूलों के सौदा-गर निकलते हैं

हम इस बस्ती को फ़र्ज़ानों की बस्ती कह नहीं सकते
यहाँ तो इक ज़रा सी बात पर ख़ंजर निकलते हैं

ज़माने में 'ज़फ़र' लोगों का अंदाज़ा ही मुश्किल है
जिन्हें नाज़ुक बदन समझो वही पत्थर निकलते हैं