उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zahe qismat ki qasid yar ka le kar payam aaya

ज़हे क़िस्मत कि क़ासिद यार का ले कर पयाम आया

زہے قسمت کہ قاصد یار کا لے کر پیام آیا

शायर: Yasir Rampuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़हे क़िस्मत कि क़ासिद यार का ले कर पयाम आया
मगर अफ़्सोस-सद-अफ़्सोस वक़्त-ए-इख़्तिताम आया

करामत देखिए साक़ी की मस्ताना निगाहों की
कि जिस दम उठ गईं रिंदों तलक ख़ुद चल के जाम आया

हसद से हाथ मल कर रह गए सारे रक़ीब उस दम
ज़बाँ पर जब किसी की इत्तिफ़ाक़न मेरा नाम आया

तरस आता है उस की बेबसी पर ख़ुद गुलिस्ताँ को
जो ताइर फ़स्ल-ए-गुल के आते-आते ज़ेर-ए-दाम आया

करोगे याद जब दुनिया से हम हो जाएँगे रुख़्सत
कहोगे तब यही तू था जो हर मुश्किल में काम आया

ख़ता की हो किसी ने उँगलियाँ मेरी ही सम्त उट्ठीं
किसी का जुर्म हो सर पर मिरे ही इत्तिहाम आया

अधूरा-पन अज़ल से था लिखा शायद मुक़द्दर में
कि ख़ुशियाँ क्या मिरे हिस्से में ग़म भी ना-तमाम आया

बुरा जब वक़्त आया सब ने 'यासिर' राह ली अपनी
न कोई चारागर ठहरा न कोई यार काम आया