उर्दू शायरी · ग़ज़ल

marzi-e-yar pe har ek KHushi war chale

मर्ज़ी-ए-यार पे हर एक ख़ुशी वार चले

مرضئ یار پہ ہر ایک خوشی وار چلے

शायर: Yasir Rampuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मर्ज़ी-ए-यार पे हर एक ख़ुशी वार चले
जो कुछ अपना था वो सब 'इश्क़ में हम हार चले

कब रुके मंज़िल-ए-मक़्सूद से पहले ये क़दम
उठ के इक बार चले हैं तो लगातार चले

देखता रह गया ज़ाहिद ये तमाशा क्या है
एक गिर्या के ‘एवज़ ख़ुल्द को मय-ख़्वार चले

छा गया अब्र लिए आ के बहारों ने क़दम
ज़ुल्फ़ लहरा के वो जब जानिब-ए-गुलज़ार चले

मय की तौबा को तो मुद्दत हुई साक़ी लेकिन
कुछ तकल्लुफ़ नहीं गर शर्बत-ए-दीदार चले

बरहमन दैर गया शैख़ जी का'बे पहुँचे
और हम दिल को लिए कूचा-ए-दिलदार चले

चाहना जुर्म है गर तुम को तो मैं मुजरिम हूँ
सर मिरा ख़म है हुज़ूर आप की तलवार चले

ठोकरें खाईं रह-ए-‘इश्क़ में 'यासिर' तुम ने
सच तो ये है कि तुम इस राह में बेकार चले