उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zalim se mohabbat ka sila mang rahe hain

ज़ालिम से मोहब्बत का सिला माँग रहे हैं

ظالم سے محبت کا صلہ مانگ رہے ہیں

शायर: Danish Aligarhi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ालिम से मोहब्बत का सिला माँग रहे हैं
नादान हैं पत्थर से वफ़ा माँग रहे हैं

फिर और कोई साज़िश-ए-रंगीं तो नहीं है
वो आज मिरे हक़ में दु'आ माँग रहे हैं

अल्ताफ़-ओ-करम आप के औरों को मुबारक
हम आप से जीने की अदा माँग रहे हैं

हम मुर्तकिब-ए-जुर्म-ए-वफ़ा हो तो चुके हैं
दो जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा माँग रहे हैं

जब मुझ से कोई उन का त'अल्लुक़ नहीं 'दानिश'
फिर क्यों मिरे जीने की दु'आ माँग रहे हैं