उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zahid ko apne zohd pe kis darja naz hai

ज़ाहिद को अपने ज़ोह्द पे किस दर्जा नाज़ है

زاہد کو اپنے زہد پہ کس درجہ ناز ہے

शायर: Nadir Kakorvi16 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ाहिद को अपने ज़ोह्द पे किस दर्जा नाज़ है
उस ने सुना नहीं कि ख़ुदा बे-नियाज़ है

तुम शम्अ'-रू हो मैं तो मुजस्सम हूँ एक शम्अ'
रग रग में मेरी हालत-ए-सोज़-ओ-गुदाज़ है

ऐ चारा-साज़ पहले निकाल उस को खींच कर
इक तीर सीने में नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ है

ख़िदमत को मेरी आज भी हाज़िर है आसमाँ
वो इस को क्या करे कि मुझे एहतिराज़ है

ज़ाहिद मय-ए-तहूर भी आख़िर शराब है
मुझ को तो मना करता है तू कब मजाज़ है

पहले गुनाहगार ही पहुँचे बहिश्त में
वो तो बड़ा करीम बड़ा बे-नियाज़ है

लिल्लाह ऐ हुजूम-ए-तमन्ना ज़रा ठहर
ये वक़्त-ए-रुख़्सत-ए-नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ है

रोज़-ए-क़यामत आज तो वाइज़ धरा नहीं
इक उम्र चाहिए उसे मुद्दत दराज़ है

ग़ुर्बत में मुझ से पूछती है मेरी बेकसी
याँ ऐ ग़रीब कौन तिरा चारा-साज़ है

ऐ हम-रहाँ बढ़ाए हुए अब क़दम चलो
दिन मुख़्तसर है और मसाफ़त दराज़ है

सोता बना है नाज़ से कोई शब-ए-विसाल
हाँ वाक़ई ये ख़्वाब है ये ख़्वाब-ए-नाज़ है

ऐ दिल न कर हर एक से तू शिकवा-ए-रक़ीब
कम्बख़्त इस में तेरा ही इफ़शा-ए-राज़ है

आख़िर मसीह ने भी लिया अपना हाथ खींच
परवरदिगार तू ही बस अब चारा-साज़ है

तुम और तुम से मेल करे कोई पाक-बाज़
अच्छी कही कि ग़ैर बड़ा पाक-बाज़ है

तर्ज़-ए-सितम कुछ और अब ईजाद कीजिए
तिरछी नज़र तो एक पसंदीदा नाज़ है

'नादिर' निकल गया है अगर कोई शे'र-ए-गर्म
सीने का सोज़ है मिरे दिल का गुदाज़ है