उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mazmun nahin hai saf nau-ahang-e-raaz hai

मज़मूँ नहीं है साफ़ नौ-आहंग-ए-राज़ है

مضموں نہیں ہے صاف نو آہنگ راز ہے

शायर: Nadir Kakorvi13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मज़मूँ नहीं है साफ़ नौ-आहंग-ए-राज़ है
हर हर्फ़ शे'र का लब-ए-ख़ामोश साज़ है

मैं आप की लगाए हूँ अपने जिगर में आग
सीने में वर्ना सोज़ न दिल में गुदाज़ है

इक बे-ख़ुदी ने डाली हैं लाखों ही गुत्थियाँ
जो बात है वो भेद है जो शय है राज़ है

वाँ हुस्न से बने हैं वो इक पैकर-ए-जमाल
याँ इक मुरक़्क़ा हसरत-ए-नज़्ज़ारा-बाज़ है

वो हैं कि बात ही नहीं सुनते ग़रीब की
मैं हूँ कि दफ़्तर-ए-गिला-हा-ए-दराज़ है

पहले था सर में हुब्ब-ए-वतन का मिरे जुनूँ
अब ख़ब्त-ए-यावा-गोई-ए-दूर-ओ-दराज़ है

अच्छा है वो शबाब कि कुछ सूझता न था
अब हर क़दम पे ख़ौफ़-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है

इक सिलसिला है ना-मुतनाही ख़याल भी
जितना दराज़ कीजिए इस को दराज़ है

हर वक़्त कश्मकश में हैं उम्मीद-ओ-बीम के
अहमक़ हैं जिन को ख़्वाहिश-ए-उम्र-ए-दराज़ है

इक आँख ख़ौफ़-ए-तीरगी-ए-क़ब्र में है बंद
और एक शौक़ अरसा-ए-महशर में बाज़ है

है ज़र्रा ज़र्रा परतव-ए-मेहर-ए-जमाल-ए-यार
दुनिया नहीं है ख़ाना-ए-आईना-साज़ है

कुछ आह-ओ-नाला का नहीं खुलता असर मगर
इतना कि इस में सोज़ है और उस में साज़ है

'नादिर' सुनाओ इक ग़ज़ल-ए-आशिक़ाना और
और इक गिलास अभी तो दर-ए-तौबा बाज़ है