उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baDhao wada-e-farda pe tum apni ibaadat bhi

बढ़ाओ वा'दा-ए-फ़र्दा पे तुम अपनी इबादत भी

بڑھاؤ وعدۂ فردا پہ تم اپنی عبادت بھی

शायर: Nadir Kakorvi14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बढ़ाओ वा'दा-ए-फ़र्दा पे तुम अपनी इबादत भी
कि फ़र्दा क्या न भूलूँगा मैं फ़र्दा-ए-क़यामत भी

शब-ए-ख़ल्वत जब उतरीं कश्तियों पर कश्तियाँ मय की
ज़मीं पर आसमाँ से आ गया दरिया-ए-रहमत भी

तसल्ली इस दिल-ए-बेताब की मैं आप ही कर लूँ
हुजूम-ए-यास से पाऊँ कहीं कम्बख़्त फ़ुर्सत भी

बहम इक मुख़्तसर से दिल में हैं शादी-ओ-ग़म दोनों
ये छोटा सा मकाँ और इस में दोज़ख़ भी है जन्नत भी

सवाल-ए-बोसा पर बोले कि देखो तुम ने फिर छेड़ा
तुम्हें कुछ हो गई है गालियाँ सुनने की आदत भी

यहाँ ज़ाहिद बने हैं और मयख़ाने से कल शब को
निकाले जब गए मय-कश तो उन में ख़ुद बदौलत भी

बने वो मुद्दई मेरे तो मेरे दोस्त बोल उट्ठे
कि हम हाज़िर हैं देने को गवाही भी शहादत भी

वो कहते हैं कि जन्नत भी है इक कूचा हसीनों का
बना लेना उसी कूचे में जा कर अपनी तुर्बत भी

नमाज़-ए-पंजगाना से है बेहतर काम क्या ज़ाहिद
मगर निय्यत से पहले ठीक कर ले अपनी निय्यत भी

बहुत अच्छा रहा जो बच गया इश्क़-ओ-मोहब्बत से
मोहब्बत है कोई ये अहल-ए-दुनिया की मोहब्बत भी

सर-ए-बालीन-ए-तुर्बत सब दिखाने के ये आँसू हैं
दिलों में ये कि हो जाए कहीं जल्दी फ़राग़त भी

फ़ना जब हो गए बहर-ए-हवादिस में तो हम को क्या
किनारे पर अगर कुछ हड्डियाँ पहुँचीं सलामत भी

शब-ए-ग़म नींद भी अव्वल तो क्यों आने लगी मुझ को
अगर सोया तो उठने का नहीं सुब्ह-ए-क़यामत भी

तिरी बातें भी 'नादिर' कितनी लच्छे-दार बातें हैं
कुछ इज़हार-ए-इताअ'त भी कुछ अंदाज़-ए-मतानत भी